एक बात मैं कहता सच्चा हूं,
की आज मैं फिर वही बच्चा हूं।
जिसे लगता है कि वो कुछ खास है,
और सभी चाहने वाले उसके पास है।
जो संसार के नियमों से अनजान है,
आखिर यही तो उसकी पहचान है।
जो गलती कर बैठता है,
जिसके पिता कान ऐठता है।
जिसे ना जीवन मे उद्देश्य की तलाश है,
ना खुद से कुछ बड़ा करने की आश है।
जिसे ना भविष्य की परवाह है,
ना रक्त मे बेवजह जोश का प्रवाह है।
जो नये के तरफ आकर्षित है,
जो बदलाव के प्रति हर्षित है।
जिसे ज़माना नासमझ कहता है,
जो बराबर उनकी उपेक्षा सहता है।
पर वाकई मे वो बस कौतूहल है,
उसकी अज्ञानता का यही तो हल है।
इसलिए प्रश्न पूछ कर परेशान करता है,
जिसके लिए ज़माना उसे शैतान कहता है।
लेकिन ज़माना तो पक्षपात से पूर्ण होता है,
और सोच का दायरा भी संकीर्ण होता है।
बचपना तो दुनिया के लिए आस है,
उसे नए ढंग से देखने का प्रयास है।
No comments:
Post a Comment