Saturday, February 7, 2026

ये जीवन

दिल मे थोड़ी बेचैनी सी है,
थोड़ा डर और खालीपन भी है। 
और साथ में है कई सारे सवाल, 
पूछते है, "क्या लोगे ये जीवन सम्भाल?"

भविष्य कि चिंता बहुत सताती है, 
और गुज़रे वक्त को दोषी ठहराती है।
अपने फैसलों को कठघरे में खड़ा कर, 
सही-गलत कि तराजू पर चढ़ा कर, 
देर तक उनका विश्लेषण करता हूँ, 
और अक्सर उन्हें गलत ही पाता हूँ। 

पर मेरे विश्लेषण में है निष्पक्षता कहाँ? 
नहीं तो आत्मविश्वास होता, है डर जहाँ!
और क्या सही-गलत की है कोई परिभाषा?
या बस दूसरे विकल्प के सही होने की है आशा? 

जो हमने जिया नहीं, उस जीवन की है अभिलाषा, 
जो कभी खिला नहीं, उस उपवन की है आशा। 
पर क्यूँ ना सींचते, उस बाग को जो खिला है, 
और क्यूँ ना जीते, उस जीवन को जो मिला है। 

Saturday, September 20, 2025

बारिश के दिन

सुबह हो गई है, पर लगता है जैसे शाम ढ़ल रही है,
घनघोर बादलों का पहरा है, और ठंडी हवाएं चल रही है।
गिली है मिट्टी, और जो कपड़े सूखने दिये है,
जो कल तपा रहा था, वो सूरज आज कितना प्रिये है।

काले बादलों कि तरह, बुरे वक्त भी आते-जाते है,
लेकिन, कौन, क्या ज़रूरी है, ये बताते जाते है।

कई अवसर छुपे है इस बारिश मे,
शायद ईश्वर ही है इस साज़िश मे।

आज चादर ज़रा ऊपर खींच कर,
और वापिस आँखे मीच कर,
चलूँ सुकून और नींद कि खोज मे,
जो रह गई थी काम के बोझ मे।

काश गरम पकौड़े मिल जाये कही,
और साथ मे एक कप चाय सही।
फिर चलूँ अपनों कि खबर-खोज मे,
जो रह गई थी काम के बोझ मे।

मन में कुछ बोल सामने आ रहे है,
कुछ लिखने का प्रस्ताव ला रहे है।
अब चलूँ अपनी कलम की खोज में,
जो रह गई थी काम के बोझ मे।