Saturday, September 20, 2025

बारिश के दिन

सुबह हो गई है, पर लगता है जैसे शाम ढ़ल रही है,
घनघोर बादलों का पहरा है, और ठंडी हवाएं चल रही है।
गिली है मिट्टी, और जो कपड़े सूखने दिये है,
जो कल तपा रहा था, वो सूरज आज कितना प्रिये है।

काले बादलों कि तरह, बुरे वक्त भी आते-जाते है,
लेकिन, कौन, क्या ज़रूरी है, ये बताते जाते है।

कई अवसर छुपे है इस बारिश मे,
शायद ईश्वर ही है इस साज़िश मे।

आज चादर ज़रा ऊपर खींच कर,
और वापिस आँखे मीच कर,
चलूँ सुकून और नींद कि खोज मे,
जो रह गई थी काम के बोझ मे।

काश गरम पकौड़े मिल जाये कही,
और साथ मे एक कप चाय सही।
फिर चलूँ अपनों कि खबर-खोज मे,
जो रह गई थी काम के बोझ मे।

मन में कुछ बोल सामने आ रहे है,
कुछ लिखने का प्रस्ताव ला रहे है।
अब चलूँ अपनी कलम की खोज में,
जो रह गई थी काम के बोझ मे। 

Saturday, May 4, 2024

लिखने कि चाह

अब मुझे अलंकारों का तो ज्ञान नहीं,
कवियों कविताओ की कोई पहचान नहीं। 
दिल मे जब कुछ ख्याल उपस्थित होते है, 
जो मन मे शब्दों की माला पिरोते है, 
वो बैठकर टाइप कर देता हूं, 
पर भाषा अंग्रेज़ी ही लेता हूं। 
तो एक बात यहा आती जरूर है, 
जो मन तुमसे कहने को मजबूर है। 
की, चाहे हम जो भी ग्रंथ पढ़ते है, 
जिस भी देवता को पूजते है, 
ये जो खयाल जेहन मे उपजते है, 
क्या वो किसी भाषा के पराधीन होते है? 

हमारे विचारों की प्रस्तुति, 
या अपने गुरु की स्तुति, 
किसी से प्यार का इज़हार,
या शिक्षकों की फटकार;
क्या ये सब अपनी मातृभाषा मे निखरती है, 
भले सबसे नहीं संभलती है, 
या अंग्रेज़ी ही ज्यादा निपुण है, 
क्योंकि आज कल तो उसी का चलन है?