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Saturday, September 20, 2025

बारिश के दिन

सुबह हो गई है, पर लगता है जैसे शाम ढ़ल रही है,
घनघोर बादलों का पहरा है, और ठंडी हवाएं चल रही है।
गिली है मिट्टी, और जो कपड़े सूखने दिये है,
जो कल तपा रहा था, वो सूरज आज कितना प्रिये है।

काले बादलों कि तरह, बुरे वक्त भी आते-जाते है,
लेकिन, कौन, क्या ज़रूरी है, ये बताते जाते है।

कई अवसर छुपे है इस बारिश मे,
शायद ईश्वर ही है इस साज़िश मे।

आज चादर ज़रा ऊपर खींच कर,
और वापिस आँखे मीच कर,
चलूँ सुकून और नींद कि खोज मे,
जो रह गई थी काम के बोझ मे।

काश गरम पकौड़े मिल जाये कही,
और साथ मे एक कप चाय सही।
फिर चलूँ अपनों कि खबर-खोज मे,
जो रह गई थी काम के बोझ मे।

मन में कुछ बोल सामने आ रहे है,
कुछ लिखने का प्रस्ताव ला रहे है।
अब चलूँ अपनी कलम की खोज में,
जो रह गई थी काम के बोझ मे।