Saturday, May 4, 2024

लिखने कि चाह

अब मुझे अलंकारों का तो ज्ञान नहीं,
कवियों कविताओ की कोई पहचान नहीं। 
दिल मे जब कुछ ख्याल उपस्थित होते है, 
जो मन मे शब्दों की माला पिरोते है, 
वो बैठकर टाइप कर देता हूं, 
पर भाषा अंग्रेज़ी ही लेता हूं। 
तो एक बात यहा आती जरूर है, 
जो मन तुमसे कहने को मजबूर है। 
की, चाहे हम जो भी ग्रंथ पढ़ते है, 
जिस भी देवता को पूजते है, 
ये जो खयाल जेहन मे उपजते है, 
क्या वो किसी भाषा के पराधीन होते है? 

हमारे विचारों की प्रस्तुति, 
या अपने गुरु की स्तुति, 
किसी से प्यार का इज़हार,
या शिक्षकों की फटकार;
क्या ये सब अपनी मातृभाषा मे निखरती है, 
भले सबसे नहीं संभलती है, 
या अंग्रेज़ी ही ज्यादा निपुण है, 
क्योंकि आज कल तो उसी का चलन है?

जो रहा वृक्ष के समान खड़ा

आंधियां जब तेज़ चले,
वृक्ष बन तुम हो खड़े।
हो जड़े इतनी मजबूत,
हो रण छोड़ने को नामंजूर।

मत सोच की तूफान है क्यूँ,
कि मैं कब तक खड़ा रहूँ यूँ।
तू इसे अपनी पहचान बना,
जो रहा वृक्ष के समान खड़ा।

कुछ फूल खुशि के झड़ जाएंगे,
कलियाँ आशा के बिखर जाएंगे। 
लेकिन होगा ना कोई तूफान बड़ा,
जो तू रहा वृक्ष के समान खड़ा। 

विश्वास की शाखाएं होंगी ढुलमुल, 
भाग्य की रेखाएं करेंगी व्याकुल।
लेकिन दिखेगा कोई रास्ता नया,
जो तू रहा वृक्ष के समान खड़ा ।