अब मुझे अलंकारों का तो ज्ञान नहीं,
कवियों कविताओ की कोई पहचान नहीं।
दिल मे जब कुछ ख्याल उपस्थित होते है,
जो मन मे शब्दों की माला पिरोते है,
वो बैठकर टाइप कर देता हूं,
पर भाषा अंग्रेज़ी ही लेता हूं।
तो एक बात यहा आती जरूर है,
जो मन तुमसे कहने को मजबूर है।
की, चाहे हम जो भी ग्रंथ पढ़ते है,
जिस भी देवता को पूजते है,
ये जो खयाल जेहन मे उपजते है,
क्या वो किसी भाषा के पराधीन होते है?
हमारे विचारों की प्रस्तुति,
या अपने गुरु की स्तुति,
किसी से प्यार का इज़हार,
या शिक्षकों की फटकार;
क्या ये सब अपनी मातृभाषा मे निखरती है,
भले सबसे नहीं संभलती है,
या अंग्रेज़ी ही ज्यादा निपुण है,
क्योंकि आज कल तो उसी का चलन है?