थोड़ा डर और खालीपन भी है।
और साथ में है कई सारे सवाल,
पूछते है, "क्या लोगे ये जीवन सम्भाल?"
भविष्य कि चिंता बहुत सताती है,
और गुज़रे वक्त को दोषी ठहराती है।
अपने फैसलों को कठघरे में खड़ा कर,
सही-गलत कि तराजू पर चढ़ा कर,
देर तक उनका विश्लेषण करता हूँ,
और अक्सर उन्हें गलत ही पाता हूँ।
पर मेरे विश्लेषण में है निष्पक्षता कहाँ?
नहीं तो आत्मविश्वास होता, है डर जहाँ!
और क्या सही-गलत की है कोई परिभाषा?
या बस दूसरे विकल्प के सही होने की है आशा?
जो हमने जिया नहीं, उस जीवन की है अभिलाषा,
जो कभी खिला नहीं, उस उपवन की है आशा।
पर क्यूँ ना सींचते, उस बाग को जो खिला है,
और क्यूँ ना जीते, उस जीवन को जो मिला है।
So! Nice
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